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Central Government Says Lifetime Ban On Convicted Politicians Is Harsh to Supreme Court ann


Supreme Court News: केंद्र सरकार ने  सजायाफ्ता नेताओं के चुनाव लड़ने पर स्थायी प्रतिबंध लगाने की मांग का विरोध किया है. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में केंद्र सरकार ने कहा है कि कानून में पहले ही सज़ा काटने के 6 साल तक चुनाव लड़ने से रोक का प्रावधान है. इसमें अगर कोई बदलाव किया जाना जरूरी होगा, तो उसे संसद देखेगी. कोर्ट कानून में बदलाव के लिए संसद को आदेश नहीं दे सकता.

केंद्र सरकार ने यह भी कहा है कि देश की कानूनी व्यवस्था में गलती के अनुपात में ही दंड की परंपरा रही है. संसद ने इस पर विचार कर के सज़ा काटने के बाद 6 साल तक चुनाव से बाहर रखने का कानून बनाया है. किसी को इससे ज़्यादा समय तक या आजीवन चुनाव लड़ने से रोक देना अधिक कठोर होगा. केंद्र सरकार ने यह जवाब वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर दाखिल किया है.

याचिकाकर्ता का तर्क
2016 में दाखिल इस याचिका में जनप्रतिनिधित्व कानून को धारा 8 को चुनौती दी गई है. इस धारा में प्रावधान है कि 2 साल या उससे अधिक की सजा पाने वाला व्यक्ति सज़ा पूरी होने के 6 साल बाद चुनाव लड़ सकता है याचिकाकर्ता का कहना है कि जिस तरह कोर्ट से दोषी ठहराए गए व्यक्ति को सरकारी नौकरी नहीं मिलती. उसी तरह  सजायाफ्ता नेताओं को दोबारा चुनाव लड़ने और सांसद/विधायक बनने की छूट नहीं मिलनी चाहिए. 4 मार्च को मामले पर अगली सुनवाई होनी है.

‘छह साल’ या ‘ताउम्र’ – कौन करेगा फैसला?
वर्तमान में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत कोई भी दोषी नेता अपनी सजा पूरी होने के बाद 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ सकता. लेकिन अब इस 6 साल की पाबंदी को आजीवन करने की मांग की जा रही है. याचिकाकर्ता का तर्क है कि दोषी नेताओं पर चुनाव लड़ने से ताउम्र प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए. सरकार का कहना है कि यह तय करना कि 6 साल पर्याप्त हैं या आजीवन बैन जरूरी है, यह संसद का विशेषाधिकार है.

क्या हो सकता है अगला कदम?
यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कड़ा रुख अपनाता है, तो संविधान और कानून में बदलाव संभव हो सकता है.यदि मामला संसद के अधिकार क्षेत्र में जाता है, तो इस पर राजनीतिक बहस और नए विधेयक की जरूरत पड़ेगी.

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