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Bombay High Court: रेलवे क्लर्क को 6 रुपए खुल्ले नहीं लौटाना पड़ा भारी, गई सरकारी नौकरी, 26 साल से चल रहा केस



<p style="text-align: justify;"><strong>Mumbai News:</strong> महाराष्ट्र में एक यात्री को छह रुपये न लौटाना रेवले के एक टिकट देने वाले क्लर्क को बहुत भारी पड़ गया है. 26 साल पुराने इस मामले में दोषी क्लर्क राजेश वर्मा की नौकरी चली गई. वहीं, अब बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी दोषी क्लर्क को राहत देने से इनकार कर दिया है. विजिलेंस टीम ने बुकिंग क्लर्क राजेश वर्मा के टिकटिंग काउंटर पर छापा भी मारा.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्या है पूरा मामला?</strong><br />ये मामला देश की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई का है. 30 अगस्त 1997 को जब बुकिंग क्लर्क राजेश वर्मा कुर्ला टर्मिनस जंक्शन मुंबई में कंप्यूटरीकृत करंट बुकिंग कार्यालय में यात्रियों के टिकट बुक कर रहे थे तब विजिलेंस ने उनके खिलाफ योजनाबद्ध तरीके से कार्रवाई की थी. रिपोर्ट्स के मुताबिक, विजिलेंस टीम ने एक आरपीएफ के जवान को नकली यात्री बनाकर क्लर्क राजेश वर्मा के पास टिकट लेने के लिए भेजा. आरपीएफ जवान ने उनसे कुर्ला टर्मिनस से आरा तक के लिए टिकट &nbsp;मांगा. कुर्ला टर्मिनस से आरा तक का किराया 214 रुपये था. इस पर नकली यात्री बने आरपीएफ जवान ने उन्हें 500 का नोट दिया. ऐसे में क्लर्क ने 286 लौटाने थे बावजूद इसके उन्होंने केवल 280 रुपये लौटाए.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इस तरह मारा छापा</strong><br />वहीं मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि इसके बाद विजिलेंस टीम ने बुकिंग क्लर्क राजेश वर्मा के टिकटिंग काउंटर पर छापा भी मारा. जब जांच की गई तो टिकट बिक्री के हिसाब से उनके रेलवे कैश में 58 रुपये कम थे. साथ ही क्लर्क की सीट के पीछे एक अलमारी से 450 रुपये बरामद किए गए. विजिलेंस टीम ने कहा था कि यह राशि यात्रियों से अधिक किराया वसूल करके इकट्ठी की गई थी.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पीठ ने क्या कहा?</strong><br />जब इन आरोपों की जांच की गई तो फरवरी 2002 में उन्हें दोषी करार देते हुए नौकरी से निकाल दिया था. इस पर क्लर्क इस आदेश के खिलाफ अपीलीय प्राधिकरण के पास पहुंचे. हालांकि जुलाई 2002 में उनकी अपील को खारिज कर दिया गया. बाद में वर्मा 2002 में इस मामले को लेकर पुनरीक्षण प्राधिकरण (कैट) के पास भी गए, जहां 2003 में उनकी दया याचिका भी खारिज कर दी गई. इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया. जहां सभी पक्षों को सुनने के बाद सात अगस्त को अदालत ने पुनरीक्षण प्राधिकरण (कैट) के आदेश को बरकरार रखते हुए क्लर्क को राहत से इनकार कर दिया है.</p>
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