रोम का पार्टनर, सोना, 0-9…Uk के इतिहासकार विलियम डेलरिंपल ने भारत को लेकर किया बड़ा दावा

250 ईसा पूर्व में अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया और उनके शासनकाल में आप देखते हैं कि प्रचारकों को आधुनिक लीबिया तक के क्षेत्र में भेजा जा रहा है. आप बौद्ध धर्म को दक्षिण की ओर फैलते हुए भी देखते हैं. तब अशोक ने अपने पुत्र महिंदा को श्रीलंका भेजा. हमने हाल ही में मध्य श्रीलंका में राज गलाह की पहाड़ी पर महिंदा का मूल स्तूप खोजा है, जिस पर ब्राह्मी लिपि में उनका नाम लिखा है.समय के साथ श्रीलंका बौद्ध गतिविधि का केंद्र बन गया और यहां से बर्मा, थाईलैंड, मलेशिया तक पहुंचा.इतिहासकार प्लिनी (Pliny) ने रोमन इलाकों से भारत के इलाकों में सोने की आश्चर्यजनक निकासी के बारे में बात की है.रोम और भारत के बीच व्यापार इतना ज्यादा था कि रोमन लोग भारत के पश्चिमी तट के प्रत्येक बंदरगाह को जानते थे. उनकी जुबान पर विशेष रूप से बारी (अब केरल)और गाजा (अब गुजरात) नाम रहता था.अमरावती से कुछ भारतीय शासकों के दरबार में उपहारों में सुंदर इथियोपियाई सामान की तस्वीरें भी मिली हैं. इससे पता चलता है कि भारत में विदेशों से बने सामानों का उपयोग भी होता था.भारत में ही उस समय रोम से भारी मात्रा में सामान के बदले सोना पहुंचता था.उस समय रोम के बारे में कहा जाता था कि वहां कभी सूर्य नहीं डूबता और भारत उसी से कमाकर बहुत अमीर होता जा रहा था.
शिक्षा की जननी नालंदा

मूल रूप से, बौद्ध धर्म सिर्फ व्यापारियों द्वारा चीन में लाया गया एक धर्म है. 5वीं और 6वीं शताब्दी तक, आप पाते हैं कि गुप्तावंश की मूर्तियों की नकल चीन में की जा रही थी.चीन के बौद्ध मंदिरों पर भारतीय दिखने वाले देवता और अप्सराएं होती थीं.इसी बीच चीन का एक भिक्षु जुआन जांग यात्रा करते हुए नालंदा विश्वविद्यालय आता है.नालंदा उस समय दुनिया का ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज था. प्राचीन एशिया का नासा था. यहां का दौरा कर चीन, कोरिया और जापान के भिक्षुओं ने किया. जुआन जांग ने बताया था कि नालंदा के पुस्तकालय में न केवल बौद्ध ग्रंथ, बल्कि वेदों, विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान से भरे हुए हैं. नालंदा में विभिन्न मठों और विश्वविद्यालय भवनों की योजना ही आज हम ऑक्सब्रिज में पाते हैं.

हम सभी अपने स्कूलों में जिन नंबरों को जानते हैं, वह ब्राह्मी से आए हैं. अमेरिका में, हम उन्हें अरबी अंक कहते हैं, क्योंकि यूरोपीय लोगों ने उन्हें अरबों से प्राप्त किया था, लेकिन अरबों ने इन्हें भारत से प्राप्त किया. जीरो भी भारत से आया. इसे तो सब मानते हैं. बीजगणित भारत ने दिया. पहली शताब्दी में ब्राह्मी लिपि में 1 से 9 तक के अंत लिखे गए. ब्राह्मी लिपि प्राचीन भारत लिपि थी. फिर इसे 9वीं शताब्दी में लिखा गया. फिर ग्यारहवीं शताब्दी में संस्कृत देवनागरी लिपि में लिखा गया. यहीं से अरब होते हुए ये यूरोप तक पहुंचा.
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